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DNA 🧬 फिंगर प्रिंट्स


डीएनए फिंगर प्रिंटिंग
डीएनए फिंगरप्रिंट किसी व्यक्ति के जीनोम के अनुक्रमण पर निर्भर करता है इसमें न्यूक्लियोटाइड नामक अणुओ के तीन अरब जोड़े सम्मिलित होते हैं सभी मानव के जीनोम लगभग 99.99% समान होते हैं किंतु शेष 0.01% में न्यूक्लियोटाइड के कुछ जोड़ें जीनोम में पुनरावृत्ति होती है इस पुनरावृत्ति का अनुक्रम प्रत्येक व्यक्ति के लिए अद्वितीय होता है इसलिए अपराध स्थल पर पुनरावृति के एक विशेष अनुक्रम से युक्त डीएनए नमो नमो नमूनों की मौजूदगी संबंधित व्यक्ति की उम्र अपराध में भागीदारी के साथ के रूप में उपयोग की जाती है 

हाल ही में आंध्र प्रदेश सरकार एक कानून का प्रारूप तैयार कर रही है जो कि एक केंद्रीकृत डेटावेस डीएनए फिंगरप्रिंट के संग्रहण और भंडारण को सक्षम बनाएगा जिससे अपराधियों का पता लगाया जा सकेगा
 
डीएनए फिंगरप्रिंट का इतिहास

फ़िंगरप्रिंटिंग का विज्ञान पहली बार 1858 में सर विलियम हर्शल द्वारा पहचान की एक विधि के रूप में इस्तेमाल किया गया था। भारत में 1897 में जलपाईगुड़ी में एक हत्या की जांच के दौरान फिंगरप्रिंट के विज्ञान की खोज की गई थी।


एलेक जेफरीज़ (1984) ने यूनाइटेड किंगडम के लीसेस्टर विश्वविद्यालय में डीएनए फ़िंगरप्रिंटिंग तकनीक का आविष्कार किया। डॉ। वीके कश्यप और डॉ। लालजी सिंह ने भारत में CCMB (सेंटर फॉर सेल और आणविक जीवविज्ञान) हैदराबाद में डीएनए फिंगरप्रिंटिंग तकनीक की शुरुआत की।

डीएनए फिंगर प्रिंट्स का प्रयोग 
#अपराधियों का पता लगाने में।
#वंशानुगत बीमारियों को पहचानने में तथा उनके लिए चिकित्सा पद्यति विकसित करने के लिये |
#बच्चे के वास्तविक माता पिता निर्धारण में।
#पैत्रक संपत्ति आदि के दावों से निपटने के लिए।
#जैविक साक्ष्यों के आधार पर अपराध अनुसंधान में। #वास्तविक अपराधी को पहचानने में|
#सेना आदि संगठनों में डीएनए फिंगर प्रिंटिंग के रिकार्ड रखे जाते हैं ताकि जरूरत पड़ने पर व्यक्तियों की पहचान की जा सके |

डीएनए फिंगरप्रिंट के लाभ 
*सटीकता अधिकांश मामलों में जहां 1 से अधिक व्यक्तियों के डीएनए पाए जाते हैं डीएनए फिंगरप्रिंट के माध्यम से अन्य लोगों में से अपराधियों की पहचान की जा सकती है *विश्वसनीयता यह नार्को एनालिसिस जोकि व्यक्ति परख होता है से अधिक विश्वसनीय है और डीएनए फिंगरप्रिंट मे जालसाजी भी नहीं हो सकती है

चुनौतियां
* साक्ष्य के रूप में डीएनए परीक्षण भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 और अपराधिक प्रक्रिया संहिता 1973 के अंतर्गत प्रावधान नहीं है 
*केंद्र ने 2012 में इसी तरह का ड्राफ्ट तैयार किया था जो कि निजता के अधिकारों के उल्लंघन के कारण विवाद में आ गया था
*अवैज्ञानिक जांच भारत में फॉरेंसिक जांचकर्ताओं और वैज्ञानिकों के बजाय एक प्रशिक्षित कॉन्स्टेबल सबसे पहले घटनास्थल पर जाता है जिसे यह नहीं पता होता कि वैज्ञानिक रूप से साक्ष्यों को कैसे एकत्र किया जाता है और इस प्रक्रिया में वह महत्वपूर्ण डीएनए साक्ष्यों का नष्ट कर देता है

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