मुद्रास्फ़ीति क्या है?( Inflation)
मुद्रास्फीति
मुद्रास्फीति की परिभाषा
मुद्रास्फीति यानी महँगाई से तात्पर्य उपभोक्ता वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य में वृद्धि होना जब उपभोक्ता वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में स्थाई या अस्थाई वृद्धि हो तो उसे मुद्रास्फीति यह महँगाई कहा जाता है।
जो चलन की मात्रा (Volume of currency) में तीव्र वृद्धि के फलस्वरूप उत्पन्न होती है।
अर्थशास्त्र की भाषा में महंगाई को मुद्रास्फीति कहते हैं सामान्य जीवन में इसके लिए महंगाई शब्द का उपयोग किया जाता है
मुद्रास्फीति एक ऐसी अवस्था है जिसका प्रभाव संपूर्ण राष्ट्र पर पड़ता है। कोई भी क्षेत्र एवं वर्ग इसके प्रभाव से नहीं बच पाता है। धनी, ऋणी, विनियोगी, व्यापारी, वेतन-भोगी, भू स्वामी, सरकार, आयात कर्ता, निर्यात कर्ता, श्रमिक, उपभोगी आदि प्रत्येक वर्ग पर इसका प्रभाव पड़ता है। पर मुद्रास्फीति का प्रभाव संपूर्ण राष्ट्र पर एक समान नहीं पड़ता है।
मुद्रास्फीति के प्रकार
मुद्रास्फीति के प्रकार (कारणों के आधार पर)
मुद्रास्फीति दो प्रकार की होती है-
मांग प्रेरित मुद्रास्फीति: डिमांड पुल इन्फ्लेशन तब उत्पन्न होता है जब अर्थव्यवस्था में कुल मांग कुल आपूर्ति से अधिक हो जाती है।
लागत प्रेरित मुद्रास्फीति : जब वस्तुओं और सेवाओं की कुल आपूर्ति में कमी के परिणामस्वरूप उत्पादन लागत में वृद्धि होती है
मुद्रास्फीति के प्रकार( मुद्रास्फीति की दर के आधार पर)
# रेंगती हुई मुद्रास्फीति: इस स्थिति में मुद्रास्फीति धीरे-धीरे बढ़ती है। कहने का अर्थ है 1 साल में लगभग 10 % तक बढ़ती है।
# तीव्र मुद्रास्फीति: इइस स्थिति में मुद्रास्फीति तेजी से बढ़ती है यानी 1 साल में लगभग 20, 100, 200 % तक चले जाती है।
# टहलने वाला मुद्रास्फीति: इस मुद्रास्फीति में मूल्यवृद्धि मध्यम (3% से 7%) हो जाती है और वार्षिक मुद्रास्फीति दर एक अंक की हो जाती हैं तो इससे Walking Inflation कहा जाता है। यह एक चेतावनी का संकेत है कि अब महंगाई बढ़ने वाली है अतः उसे नियंत्रित कर लिया जाए।
# दौड़ने वाला मुद्रास्फीति: यह मुद्रास्फीति एक निश्चित दर से बढ़ने लगती है तो उसे Running Inflation कहते हैं। यह मुख्यता 10 और 20 % के बीच में रहता है। इस दर पर मुद्रास्फीति अर्थव्यवस्था पर प्रभाव डालती है और आसानी से उच्च स्तर पर रहना शुरू कर देती है।
# अति मुद्रास्फीति: इसमें मुद्रास्फीति बहुत तेजी से बढ़ती है यह 1 साल में 30% से ज्यादा हो जाती है।
# मंदी:इसमें मुद्रास्फीति की स्थिति ना तो बढ़ती है ना तो घटती है इसमें इसके बढ़ने की दर स्थिर रहती है।
मुद्रा स्फीति के कारण
मुद्रास्फीति कई कारणों से हो सकती है जिसमे कुछ प्रमुख कारण इस प्रकार है -
# सार्वजनिक व्यय में वृद्धि - सार्वजनिक व्यय में वृद्धि होने के कारण जनता के पास धन की मात्रा बढ़ जाती है और धन को खर्च करने हेतु मांग अधिक उत्पन्न हो जाती है। मांग बढ़ने व उत्पादन शिथिल होने पर मुद्रा का मूल्य गिर जाता है।
उत्पादन आपूर्ति - उत्पादन में कमी से और दुकानदारों की जमाखोरी से भी मुद्रास्फीति की दर बढ़ती है क्योंकि बाजार में मांग अधिक व उत्पादन कम हो जाता है।
# उत्पादन में आपूर्ति -सरकार द्वारा लगाए जाने वाले अप्रत्यक्ष कर से लागत मूल्य में वृद्धि होती है जो कि वस्तुओं के मूल्य में वृद्धि का कारक है।
# जनसंख्या वृद्धि - जनसंख्या वृद्धि भी मुद्रास्फीति का एक प्रमुख कारक है क्योंकि जनसंख्या में वृद्धि से मांग में भी वृद्धि होती है।
# ब्याज दरों में तरलता - यदि बैंक द्वारा ब्याज दरों में कमी होगी तो बाजार में अधिक मुद्रा का प्रसार होगा। अर्थात कम ब्याज दर के कारण लोग अधिक पैसा उधार ले सकते हैं।
# वेतन में वृद्धि - कर्मचारियों की वेतन में वृद्धि होना परंतु उसी अनुपात में कुल उत्पादन में वृद्धि ना होना भी मुद्रास्फीति का कारक है।
आयात में वृद्धि - आयात में वृद्धि होने से देश की मुद्रा बाहर चली जाती है जिसकी पूर्ति हेतु अधिक मुद्रा छापने की आवश्यकता सरकार को पड़ती है। अत्याधिक मुद्रा निर्गमन से मुद्रा का प्रसार अधिक हो जाता है।
मुद्रास्फीति के प्रभाव
मुद्रास्फीति उपभोक्ताओं और समग्र अर्थव्यवस्था पर एक चिंताजनक प्रभाव पैदा करती है। इनमें से कुछ में शामिल हैं:
* आपके निवेश के कुल मूल्य में कमी। यह आपके सेवानिवृत्ति के सुनहरे वर्षों के लिए हो सकता है।
* उपभोक्ताओं की खर्च करने की शक्ति में कमी।
* मांग में कमी से संगठन अपने उत्पादन और विनिर्माण को कम करते हैं।
* इसके परिणामस्वरूप श्रम बलों की छंटनी होती है।
बेरोजगारी बढ़ रही है।
* चूंकि उत्पादन और विनिर्माण प्रक्रियाएं गंभीर रूप से प्रभावित होती हैं, इसलिए घरेलू उत्पादन प्रतिस्पर्धी होना बंद कर देता है। इसका असर मुद्रा पर पड़ता है, जिसका अवमूल्यन होता है।
* अर्थव्यवस्था वृद्धि और विकास में पूर्ण मंदी का अनुभव करती है
* उपरोक्त तथ्यों के बावजूद, अर्थशास्त्री मुद्रास्फीति की 2-3% दर को एक स्वस्थ संकेत मानते हैं क्योंकि इसके परिणामस्वरूप प्रत्यक्ष वेतन वृद्धि और संगठनों के राजस्व में वृद्धि होती है। इससे अर्थव्यवस्था में पूंजी का प्रवाह बढ़ता है।
मुद्रास्फीति की मापन
थोकमूल्य सूचकांक (Wholesale Price Index-WPI)-
यह भारत में सबसे अधिक इस्तेमाल किया जाने वाला मुद्रास्फीति संकेतक (Inflation Indicator) है।
इसे वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय (Ministry of Commerce and Industry) के आर्थिक सलाहकार (Office of Economic Adviser) के कार्यालय द्वारा प्रकाशित किया जाता है।
इसमें घरेलू बाज़ार में थोक बिक्री के पहले बिंदु किये जाने-वाले (First point of bulk sale) सभी लेन-देन शामिल होते हैं।
इस सूचकांक की सबसे प्रमुख आलोचना यह है कि आम जनता थोक मूल्य पर उत्पाद नहीं खरीदती है।
वर्ष 2017 में अखिल भारतीय WPI के लिये आधार वर्ष 2004-05 से संशोधित कर 2011-12 कर दिया गया है।
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (Consumer Price Index-CPI)-
यह खुदरा खरीदार के दृष्टिकोण से मूल्य परिवर्तन को मापता है।
यह चयनित वस्तुओं और सेवाओं के खुदरा मूल्यों के स्तर में समय के साथ बदलाव को मापता है, जिस पर एक परिभाषित समूह के उपभोक्ता अपनी आय खर्च करते हैं।
CPI के चार प्रकार निम्नलिखित हैं:
1. औद्योगिक श्रमिकों (Industrial Workers-IW) के लिये CPI
2. कृषि मज़दूर (Agricultural Labourer-AL) के लिये CPI
3. ग्रामीण मज़दूर (Rural Labourer-RL) के लिये CPI
4. CPI (ग्रामीण/शहरी/संयुक्त)
इनमें से प्रथम तीन को श्रम और रोज़गार मंत्रालय में श्रम ब्यूरो (labor Bureau) द्वारा संकलित किया गया है। जबकि चौथे प्रकार की CPI को सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (Ministry of Statistics and Programme Implementation) के अंतर्गत केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (Central Statistical Organisation-CSO) द्वारा संकलित किया जाता है।
CPI का आधार वर्ष 2012 है।
मुद्रास्फीति को नियंत्रण करने के उपाय
मुद्रास्फीति को रोकने के लिए निम्न तीन प्रकार के उपायों का सहारा लिया जा सकता है:-
(I) मौद्रिक उपाय,
(II) राजकोषीय उपाय,
(III) अन्य उपाय।
मौद्रिक उपाय
(1) मुद्रा निकालने सम्बन्धी नियमों को कठोर बनाना: मुद्रास्फीति की मात्रा कम करने के लिए सरकार के लिए यह आवश्यक है कि मुद्रा निकालने सम्बन्धी नियमों को कड़ा करें ताकि केन्द्रीय बैंक को अतिरिक्त मुद्रा निकालने में अधिक कठिनाई हो। इसके लिए नोट के पीछे रखे जाने वाले स्वर्ण अथवा विदेशी-विनिमय के कोषों की मात्रा में वृद्धि कर दी जाती है और यदि पहले से कोई कोष नहीं रखे जा रहें हों तो कोष रखने की व्यवस्था आरम्भ की जाती है।
(2) पुरानी मुद्रा वापस लेकर नई मुद्रा देना: मुद्रास्फीति बहुत भयंकर होने की दशा में साधारण उपचार उपयोगी नहीं हो सकते। अत: पुरानी सब मुद्राएँ समाप्त कर उनके बदले में नयी मुद्राएँ दे दी जाती हैं। ऐसा करने में प्राय: पुरानी बहुत-सी मुद्राओं को एक नई मुद्रा परिवर्तित किया जाता है।
(3) साख-स्फीति को कम करना (Reducing credit inflation): मुद्रास्फीति को कम करने के लिए साख-स्फीति को कम करना आवश्यक है। इसके लिए केन्द्रीय बैंक द्वारा बैंक दर बढ़ाकर, प्रतिभूतियाँ बेचकर तथा बैंकों से अधिक कोष माँगकर, साख कम की जा सकता किया जाता है। केन्द्रीय बैंक को ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए। जिससे साख लेना अधिक महँगा हो जाय।
राजकोषीय उपाय
( 1) बजट में सन्तुलन: सरकार को मुद्रास्फीति के समय घाटे के बजट की नीति नहीं मुद्रा का निर्गमन करना पड़ेगा जो मुद्रास्फ़ीति को अधिक भयावह बना देगा। अत: बजट को अपनानी चाहिए क्योंकि यदि बजट घाटे का है तो उसकी पूर्ति करने के लिए सरकार को अतिरिक्त संतुलित रखा जाना चाहिए।
(2) ऋण-प्राप्ति (Obtaining Loans): मुद्रास्फीति कम करने के लिए सरकार को ऋण-पत्र (debentures) बेचने चाहिए और जनता को यह पत्र खरीदने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। इनामी बॉण्ड अथवा बचत-पत्र भी ऐसी राशियों में निर्गमित करने चाहिए। जिन्हें सब वर्गों के व्यक्ति खरीद सकें। यह ऋण-पत्र अधिकतर अल्पकालीन होने चाहिए ताकि जनता को उन्हें खरीदने में कोई संकोच न हो।
(3) सार्वजनिक व्यय पर नियंत्रण: मुद्रास्फीति के समय सरकार को अपने व्यय में कमी कर देनी चाहिए जिससे अतिरिक्त मुद्रा लोगों के हाथों में न पहुँच सकें। विशेष रूप से अनुत्पादक व्यय को तो रोक ही देना चाहिए, क्योंकि इससे उत्पादन में वृद्धि नहीं होती तथा कीमतें बढ़ने लगती हैं।
(4) बचतों को प्रोत्साहन: यदि जनता के पास उपलब्ध क्रय-शक्ति को लगातार व्यय किया जावे तो निश्चित ही कीमतें बढ़ने लगती हैं। अत: सरकार को बैंकों एवं डाकघरों के माध्यम से ऐसी नीतियाँ कार्यान्वित करनी चाहिए जिससे लोग बचत करने के लिए प्रोत्साहित हों। इसके लिए आकर्षक ब्याज की दर भी अपनानी चाहिए।
(5) मजदूरी बन्धन (Freezing of Wages): मुद्रास्फीति पर रोक लगाने के लिए प्राय: मजदूरी को बन्धित करने की नीति अपनाई जाती है जिसके अनुसार मज़दूर और मालिक मिलकर यह समझौता कर लेते हैं कि आगामी 5 या 10 वर्ष तक मजदूरी में कोई वृद्धि नहीं की जायगी। द्वितीय महायुद्ध के पश्चात् जर्मनी ने अपने आर्थिक विकास के लिए मजदूरी बंधन की नीति अपनाई।
(6) उत्पादन वृद्धि (Increasing Production): उत्पादन की मात्रा में वृद्धि से भी मुद्रास्फीति का प्रभाव कम हो जाता है, क्योंकि वस्तुओं की पूर्ति पहले से बढ़ जाती है। अतः सरकार द्वारा ऐसे उद्योगों के वास्ते लाइसेंस दिए जाने चाहिए जिनमें कम पूँजी लगानी पड़े और शीघ्र उत्पादन द्वारा उपभोक्ताओं की अधिक से अधिक आवश्यकताएं पूरी कर सकें।
(7) मूल्य-नियन्त्रण (Price Control): स्फीति कम करने के लिए वस्तु-मूल्यों पर भी कड़े नियंत्रण लगाने चाहिए और उपभोक्ताओं को कम माल खरीदने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।
अन्य उपाय (Other Measures)
(1) मूल्य नियन्त्रण एवं राशन व्यवस्था लागू करना (Adoption of Price Control and Rationing): मुद्रास्फीति के कारण वस्तुओं तथा सेवाओं के मूल्यों में जो वृद्धि होती है उसका प्रभाव कम करने के लिए सरकार प्रायः मूल्य नियंत्रण तथा राशन व्यवस्था लागू करती है। इससे लोगों को कुछ वस्तुएँ सस्ती तो मिलती हैं, परन्तु उनकी मात्रा बहुत कम होती है।
(2) निश्चित आय वाले वर्ग को महँगाई-भत्ता देना (Provision of Dearness Allowance to fixed Income Class): मुद्रास्फीति का सबसे बुरा प्रभाव निश्चित आय वाले वर्ग पर पड़ता है, क्योंकि मूल्य बढ़ जाने से उनकी वास्तविक आय कम हो जाती है। इसकी पूर्ति करने के लिए इस वर्ग के लोगों को महँगाई-भत्ता देने की व्यवस्था की जाती है, परन्तु महँगाई-भत्ता केवल आंशिक सहायता होती है, क्योंकि यह मूल्य वृद्धि की तुलना में बहुत कम होता है।
(IV) मूल्यों में सहायता (Subsidy in Respect of Price): कुछ वस्तुएँ ऐसी होती हैं जिन्हें विदेशों से आयात करना पड़ता है अथवा जिनके मूल्य अंतर्राष्ट्रीय मूल्यों द्वारा निर्धारित होते हैं। कभी-कभी सरकार इनमें से कोई वस्तु (जैसे अनाज) जनता को सस्ते मूल्य पर देना चाहती है तो लागत-मूल्य और विक्रय-मूल्य में जो अंतर होता है वह घाटा स्वयं सरकार सहन कर लेती है। उदाहरणत: यदि बर्मा से आयात किए गए चावल का भाव 200 रुपए क्विन्टल हो और सरकार बंगाल की जनता को 180 रुपए क्विन्टल के भाव चावल देना चाहे तो वह 20 रुपए क्विन्टल का घाटा सहन कर लेती है।
मुद्रास्फीति के प्रभाव को कम करने के लिए किए गए यह सब यत्न केवल अल्पकालीन तथा अस्थाई सहायता मात्र हैं, मुद्रास्फीति के भीषण रोग का इलाज नहीं।
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