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भारत में बेरोजगारी (Unemployment in India)

भारत मे बेरोजगारी (Unemployment in India)

भारत में बेरोजगारी की समस्या दिन व दिन बढ़ती जा रही है सरकार बेरोजगारी को कम करने के लिऐ अनेक प्रयास करती है नई नई योजना बनती है लेकीन फिर भी बेरोजगारी की समस्या का कोई हल नही निकलता है
Centre for monitoring Indian economy(CMIE) के आंकड़ों से पता चला है कि अक्टूबर 2022 में भारत में बेरोजगारी दर सितंबर में 6.4प्रतिशत से  बढ़कर 7.8प्रतिशत हो गई है ।

                           बेरोजगारी
*श्रम बल के अंतर्गत आने वाला 
*व्यक्ति न्यूनतम वेतन पर अधिकार प्राप्त नहीं                              जब किसी देश में पार करने वाली जनशक्ति अधिक होती है और कार्य करने के लिए राजी होते हुए भी लोगों को प्रचलित मजदूरी सरकार नहीं मिलता है तो ऐसी व्यवस्था को बेरोजगारी की संज्ञा दी जाती है बेरोजगारी का होना या ना होना श्रम की मांग और उसकी आपूर्ति के बीच स्थिर अनुपात पर निर्भर करता है।

बेरोजगारी के प्रकार
1-खुली बेरोजगारी 
2-अल्प बेरोजगारी 
3-घर्षण जनित बेरोजगारी 
4-चक्रीय बेरोजगारी 
5-शिक्षित बेरोजगारी 
6-प्रच्छन्न बेरोजगारी 
1-खुली बेरोजगारी -संभल के अंतर्गत आने वाला व्यक्ति जिसे न्यूनतम वेतन पर अधिकार प्राप्त ना हो रहा हो।
2-अल्प बेरोजगारी संभल के अंतर्गत आने वाला व्यक्ति जिसे योग्यता क्षमता अनुसार कार्य प्राप्त ना हो रहा हो।
3-घर्षण जनित बेरोजगारी किसी कर्मचारी द्वारा एक रोजगार छोड़कर दूसरे रोजगार को प्राप्त करने के बीच का अंतराल।
 4-चक्रीय बेरोजगारी- बाजार अर्थव्यवस्था के अंतर्गत तेज और मंदी के समय आने वाली बेरोजगारी ।
5-शिक्षित बेरोजगारी -दोस्तपुर शिक्षा प्रणाली के कारण तकनीकी कुशलता में कमी के कारण आने वाली ।
 6-प्रच्छन्न बेरोजगारी- श्रमिक कार्य मैं तो रोज कार होता है लेकिन सीमांत उत्पादकता शून्य होती है।

 ग्रामीण बेरोजगारी- CMIE द्वार द्वारा जारी आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार दिसंबर 2020 तक बेरोजगारी की दर 8.3 फीसदी है जोकि रहती बेरोजगारी 8.8 फ़ीसदी से थोड़ी कम है किंतु इसका तात्पर्य यह नहीं है कि ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार के आर्थिक विकल्प मौजूद है।
शहरी बेरोजगारी-ग्रामीण क्षेत्रों में प्रसन्नता मौसमी बेरोजगारी की अधिकता है वहीं शहरी क्षेत्रों में औद्योगिक शिक्षित एवं तकनीकी प्रकार की बेरोजगारी की प्रमुखता है।
संगठित क्षेत्र बनाम असंगठित -असंगठित क्षेत्र में रोजगार ज्यादातर MSME आते हैं जीडीपी में अहम भूमिका 2019 -20 के दौरान कुल जीवीए में एमएसएमई की 32% हिस्सेदारी कुल निर्यात में एमएसएमई से जुड़े उत्पादों की 49 % हिस्सेदारी गैर कृषि एमएसएमई में 11 करोड़ भी अधिक लोग रोजगार में संलग्न (कृषि >उद्योग >एमएसएमई> बड़े उद्योग >सेवा क्षेत्र)
महिला- पुरुष रोजगार-2020 में रोजगार पर सब्सिडी मंत्रालय की ओर से जारी श्रमबल सर्वेक्षण रिपोर्ट 2018-19 के अनुसार पहली बार नौकरियों में शहरी महिलाओं की हिस्सेदारी पुरुषों की अपेक्षा अधिक पाई गई।
#शहरों में कुल 52.1% महिला 45.7% पुरुष कामकाजी है #रोजगार स्थाई मजदूरों में महिलाओं की हिस्सेदारी घटी है #नौकरी में उनकी हिस्सेदारी करीब 10 परसेंट बड़ी है।
भारत में बेरोजगारी की प्रवत्ति- ग्रामीण क्षेत्रों की अपेक्षा शहरी क्षेत्रों में बेरोजगारी का विस्तार अधिक है पुरुषों के बीच महिलाओं में बेरोजगारी की दर अधिक है बेरोजगारी में रोजगार अधिक है।

बेरोजगारी के कारण(Causes of Unemployment)
भारत में रोजगार के प्रमुख कारण नीचे दिए गए हैं:
सामाजिक कारक:
भारत में जाति व्यवस्था प्रचलित है कुछ क्षेत्रों में विशिष्ट जातियों के लिये कार्य निषिद्ध है।
बड़े व्यवसाय वाले बड़े संयुक्त परिवारों में बहुत से ऐसे व्यक्ति होंगे जो कोई काम नहीं करते हैं तथा परिवार की संयुक्त आय पर निर्भर रहते हैं।
जनसंख्या का तीव्र विकास:
भारत में जनसंख्या में निरंतर वृद्धि एक बड़ी समस्या बन गई है।
यह बेरोज़गारी के प्रमुख कारणों में से एक है।
कृषि का प्रभुत्व:
भारत में अभी भी लगभग आधा कार्यबल कृषि पर निर्भर है।
हालाँकि भारत में कृषि अविकसित है।
साथ ही यह मौसमी रोज़गार भी प्रदान करती है।
कुटीर और लघु उद्योगों का पतन:
औद्योगिक विकास का कुटीर और लघु उद्योगों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।सरकार द्वारा चलाई गाई पह,
कुटीर उद्योगों का उत्पादन गिरने से कई कारीगर बेरोज़गार हो गए।
श्रम की गतिहीनता:
भारत में श्रम की गतिशीलता कम है। परिवार से लगाव के कारण लोग नौकरी के लिये दूर-दराज़ के इलाकों में नहीं जाते हैं।
कम गतिशीलता के लिये भाषा, धर्म और जलवायु जैसे कारक भी ज़िम्मेदार हैं।
शिक्षा प्रणाली में दोष:
पूंजीवादी दुनिया में नौकरियाँ अत्यधिक विशिष्ट हो गई हैं लेकिन भारत की शिक्षा प्रणाली इन नौकरियों के लिये आवश्यक सही प्रशिक्षण और विशेषज्ञता प्रदान नहीं करती है।
इस प्रकार बहुत से लोग जो कार्य करने के इच्छुक हैं, वे कौशल की कमी के कारण बेरोज़गार हो जाते हैं।

बेरोजगारी का प्रभाव(Impact Of Unemployment)
किसी भी राष्ट्र में बेरोजगारी का अर्थव्यवस्था पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ता है:
*बेरोजगारी की समस्या गरीबी की समस्या को जन्म देती है।
सरकार को अतिरिक्त उधारी का बोझ झेलना पड़ता है *क्योंकि बेरोजगारी उत्पादन में कमी और लोगों द्वारा वस्तुओं और सेवाओं की कम खपत का कारण बनती है।
*बेरोजगार व्यक्ति असामाजिक तत्वों के बहकावे में आसानी से आ सकते हैं। इससे उनका देश के लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास उठ जाता है।
*लंबे समय से बेरोजगार लोग पैसा कमाने के लिए अवैध और गलत गतिविधियों में लिप्त हो सकते हैं जो देश में अपराध को बढ़ाता है।
*बेरोजगारी देश की उद्योग को प्रभावित करती है क्योंकि संसाधन आय के लिए अधिकतर रूप से योजना के लिए जारी किए गए कार्यबल वास्तव में शेष रोजगार आबादी पर स्थायी हो जाते हैं, इस प्रकार राज्य के लिए सामाजिक-आर्थिक लागत में वृद्धि होती है। उदाहरण के लिए, बेरोजगारी में 1% की वृद्धि से सकल घरेलू उत्पाद में 2% की कमी आती है।
*अक्सर यह देखा जाता है कि निर्देशांक लोग ड्रग्स और शराब के आदी हो जाते हैं या आत्महत्या करने का प्रयास करते हैं, जिससे देश की इच्छा का नुकसान होता है।

सरकार द्वारा चलाई गाई पहल
1979 में सरकार ने TRYSEM - स्वरोजगार के लिए ग्रामीण युवाओं का प्रशिक्षण शुरू किया इस योजना का उद्देश्य 18 से 35 वर्ष की आयु के ग्रामीण क्षेत्रों के युवाओं को स्वरोजगार के लिए कौशल प्राप्त करने में मदद करना था। इस योजना के तहत प्राथमिकता क्षेत्र/अनुसूचित जनजाति वर्ग की महिलाओं और युवाओं को दी गई थी।
सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के पूर्ण अवसर पैदा करने के लिए वर्ष 1980 में IRDP - एकीकृत ग्रामीण विकास कार्यक्रम (IRDP) शुरू किया।
1982 में श्री धर्मस्थल मंजूनाथेश्वर एजुकेशनल ट्रस्ट, केनरा बैंक और सिंडिकेट बैंक संयुक्त रूप से RSETI / RUDSETI नामक एक नई पहल की कोशिश की गई थी। RUDSETI का उद्देश्य, ग्रामीण विकास और स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान का संक्षिप्त नाम युवाओं के बीच रोजगार की समस्या को कम करना था। ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान/आरआईटीआई अब राज्य और केंद्र सरकार के सक्रिय सहयोग से ग्राहक आपके द्वारा लिए जाते हैं।
जवाहरलाल रोजगार योजना (जेआरवाई) की शुरुआत अप्रैल 1989 में दो मौजूदा वेतन रोजगार कार्यक्रम यानी आरएलईजीपी - ग्रामीण भूमि पर आधारित रोजगार योजना
एनआरईपी - राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम को राज्य और केंद्र के बीच 80:20 लागत-साझाकरण के आधार पर विलय करके की गई। था।
मनरेगा - महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार अधिनियम 2005 में लोगों को काम का अधिकार प्रदान करने के लिए शुरू किया गया। मनरेगा की एक रोजगार योजना का उद्देश्य उन सभी को प्रति वर्ष न्यूनतम 100 दिनों के भुगतान वाले काम की रूप से सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना है, जिसके वयस्क सदस्य कुशल श्रम-गहन कार्य का विकल्प चुनते हैं। मनरेगा के विवरण के लिए नीचे दिए गए लिंक को देखें। 
पीएमकेवीवाई - प्रधानमंत्री सहायता विकास योजना 2015 में शुरू की गई थी। पीएमकेवीवाई का उद्देश्य देश के युवाओं को सुरक्षित बेहतर व्यवहार प्राप्त करने के लिए उद्योग-संबंधित कौशल प्रशिक्षण प्राप्त करने में सक्षम बनाना था। प्रधान मंत्री कुशल विकास योजना के बारे में अधिक जानकारी के लिए दिए गए लिंक को देखें। 
सरकार ने 2016 में स्टार्ट-अप इंडिया योजना शुरू की थी। कृषि कार्यक्रम का उद्देश्य एक ऐसा संगठन तंत्र विकसित करना था जो पूरे देश में उद्यमशीलता का पोषण और प्रचार करता हो। नीचे दिए गए लिंक में प्रसार भारत योजना के बारे में विस्तृत जानकारी देखें।
स्टैंड अप इंडिया योजना भी 2016 में शुरू की गई थी जिसका उद्देश्य महिलाओं और घोषणाओं / घोषणाओं के बारे में घोषणाओं को 10 लाख रुपये और रुपये के बीच बैंक ऋण की सुविधा प्रदान करना था। ग्रीनफील्ड उद्यम स्थापित करने के लिए 1 करोड़। स्टैंड-अप इंडियापर विवरण लिंक पेज में दिया गया है।
राष्ट्रीय कौशल विकास मिशन की स्थापना नवंबर 2014 में 'कौशल भारत' एजेंडे को 'मिशन मोड' में चलाने के लिए की गई थी ताकि मौजूदा कौशल प्रशिक्षणों को शुरू किया जा सके और कौशल प्रयास के पैमाने और गुणवत्ता को गति के साथ जोड़ा जा सके । विस्तार से राष्ट्रीय कौशल विकास मिशन की जांच करें।

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