Rowlatt Act & Jallianwala Bagh Massacre (1919) - UPSC Modern History Notes
रॉलेट एक्ट क्या था ? What was the Rowlatt Act 1919?
रॉलेट एक्ट( Rowlatt Act) 1919
रोलेट एक्ट 1918 में जस्टिन सिडनी रोलेट की अध्यक्षता में गठित सेडिसन कमेट की सिफारिशों पर आधारित था इसका उद्देश्य प्रथम विश्व युद्ध के समय भारत डिफेंस ऑफ इंडिया एक्ट के प्रावधानों कोई स्थाई रूप देना था सभी गैर सरकारी भारतीय सदस्यों के विरोध के बाद भी 18 मार्च 1919 को इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउसिल द्वारा इस एक्ट को पास कर दिया गया इस एक्ट के प्रावधानों के अनुसार विशेष न्यायालय द्वारा किसी को भी मात्र राजद्रोही कार्य करने अथवा राजद्रोह आत्मक घोषित की गई सामग्री रखने की क्षमत के आधार पर बिना मुकदमा चलाए 2 वर्ष तक हिरासत में रखने का अधिकार था इस एक्ट का उद्देश्य राष्ट्रीय क्रांतिकारी एवं सक्रिय राजनीतिज्ञों की गतिविधियों को चलना था क्योंकि इस समय रूस की शाम में वादी क्रांति का प्रभाव पूरे विश्व में फैल रहा था
रोलेट एक्ट के प्रमुख प्रावधान
*केवल शंका के आधार पर बिना कोई मुकदमा चलाएं 2 वर्ष तक हिरासत में रखने का प्रावधान था
*इस एक्ट के अंतर्गत एक विशेष न्यायालय की स्थापना की गई जिसमें उच्च न्यायालय की तीन वकील थे यह न्यायालय ऐसे तत्वों को मान कर सकता था जो विधि के अंतर्गत मान नहीं थे इस के निर्णय के विरुद्ध कहीं अपील नहीं की जा सकती थी
*न्यायालय द्वारा बनाए गए नियम के अनुसार प्रांतीय सरकारों को बिना वारंट के तलाशी गिरफ्तारी तथा बंदी प्रत्यक्षीकरण के अधिकार को रद्द करने आदि की साधारण शक्तियां दे दी गई
* इस एक्ट को" नो वकीलों नो दलीलों नो अपील "के कारण काला कानून की संज्ञा दी गई
चंपारण तथा खड़ा आंदोलन के प्राप्त अनुभव गांधीजी को अदम्य साहस ही बना दिया इस इतिहास और विश्वास के कारण उन्होंने फरवरी 1919 में प्रस्तावित रोलेट एक्ट के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन का आवाहन किया ब्रिटिश सरकार आतंकवादी गतिविधियों को दबाने के नाम पर भारतीयों के मौलिक अधिकारों का हनन करना चाहती थी यह एक ऐसे समय पारित हुआ जब भारतीय जनता संवैधानिक सुधारों के आशा बनाए बैठी थी 1917 के अंत में मोंटेग्यू चारा द्वारा ब्रिटिश पार्लियामेंट में भारत में उत्तरदाई सरकार स्थापित करने का वादा किया गया था संवैधानिक प्रतिरोध को जब कोई असर नहीं हुआ तो गांधी जी ने सत्याग्रह प्रारंभ करने का सुझाव दिया एक सत्याग्रह सभा गठित की गई जिसमें ज्यादातर होम रूल लीग के युवा सदस्य जो अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष करने के लिए व्याघ्र थे देशव्यापी हड़ताल उपवास और प्रार्थना सभाएं आयोजित करने का फैसला किया गया साथ ही कुछ विशेष कानून की अवज्ञा करने का भी निर्णय लिया गया आंदोलन प्रारंभ करने के लिए 6 अप्रैल रविवार की तारीख तय की गई हड़ताल का दिन जानबूझकर किया गया जिसमें सभी वर्गों को हिस्सेदारी संभव हो सके गांधीजी ने ने स्वामी श्रद्धानंद द्वारा दिए गए लगाना अदायगी के सुझाव को अस्वीकृत कर दिया गांधीजी ने विरोध को जन आंदोलन में बदलने के लिए मार्च-अप्रैल के मध्य मुंबई, दिल्ली ,इलाहाबाद ,लखनऊ सहित अनेक दक्षिण भारतीय नगरों का दौरा किया आंदोलन में जो स्वरूप ग्रहण किया गया वह अप्रत्याशित था तारीख के बारे में कुछ भ्रम के कारण दिल्ली में 30 मार्च को हड़ताल आयोजित की गई जिसके दौरान काफी हिंसा भड़की बाकी स्थानों पर भी सभा का हड़ताल आयोजित की गई तो हिंसा भड़की।
प्रथम विश्वयुद्ध के समय (सेना में निर्मम भर्ती ,भर्ती युद्ध कालीन अवैध वसूली या 1915 में गदर आंदोलन का कठोर दमन, पंजाब के बड़े बैंकों में से एक पीपल्स बैंक का दीवाना निकलने मे ओ डायर का सक्रिय हाथ था ,जिसमें व्यापारी समुदाय में असंतोष था) सरकारी दमन और अत्याचार से जुड़ने वाले पंजाब में प्रतिरोध यह मौका गतिविधियों के लिए अवसर साबित हुआ जनता काफी उग्र थी अमृतसर और लाहौर में तो नियंत्रण कर पाना मुश्किल हो गया विरोध के समय हिंदू मुस्लिम एकता ( मुस्लिम समुदाय को गांधी जी द्वारा राष्ट्रीय विरोध में जोड़ने का प्रयास एवं प्रथम विश्व युद्ध में तुर्की की हार पर खलीफा के भविष्य को लेकर उठी मुसलमान में असमंजस की स्थिति )का अभूतपूर्व परिचय दिखा कभी इकबाल ने सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तान हमारा जैसे राष्ट्रवादी की कविता लिखें इससे पहले और बाद में सांप्रदायिक घटनाओं के लिए विख्यात रहा सरकार अब चिंतित हो गई गांधी जी ने पंजाब आकर लोगों को समझाने बुझाने का प्रयास किया पर सरकार ने उन्हें पंजाब में घुसने नहीं दिया उन्हें मुंबई भेज दिया गया मुंबई पहुंचने पर गांधी जी ने देखा कि मुंबई और गुजरात में आक्रोश व्याप्त है उन्होंने वहीं रहकर जनता को शांत करने का निर्णय लिया!
जलियांवाला बाग हत्याकांड (Jallianwala Bagh Hatyakand)1919
अमृतसर में सत्याग्रहियो पर गोली चलाने तथा अपने नेताओं डॉक्टर सत्यपाल बार डॉक्टर किचलू की गिरफ्तारी के खिलाफ टाउन हॉल और पोस्ट ऑफिस पर हमले किए गए और इस दौरान हिंसा भी हुई नगर का प्रशासन जनरल डायर के हाथों सौंप दिया गया डायर ने जनसभा आयोजित करने पर प्रतिबंध लगा दिया 13 अप्रैल 1919 को बैसाखी के दिन अमृतसर के जलियांवाला बाग में एक सार्वजनिक सभा का आयोजन किया गया सभा में भाग लेने वाले अधिकांश लोग आस-पास के गांव से आए हुए ग्रामीण थे जो वैशाखी मेले में भाग लेने आए थे तथा सरकार द्वारा शहर में आरोपित प्रतिबंध से बेखबर थे जनरल डायर ने इस सभा के आयोजन को सरकारी आदेश की अवहेलना समझा तथा सभा स्थल को सहस्त्र सैनिकों के साथ घेर लिया डायर ने बिना किसी पूर्व चेतावनी के सभा पर गोलियां चलाने का आदेश दे दिया सरकारी आंकड़ों के अनुसार 369 लोग मारे गए थे जबकि वास्तव में यह संख्या कहीं अधिक थी हंटर आयोग के सामने डायर ने दुखों को व्यक्त किया कि उनका गोला-बारूद खत्म हो गया था वह संकरी गलियों में बख्तरबंद गाड़ी नहीं ले जा सका।
परिणाम
एक घटना में 769 लोग मारे गए जिसमें युवा महिलाएं बूढ़े बच्चे सभी शामिल थे जलियांवाला बाग हत्याकांड में पूरा देश स्तब्ध रह गया फैंसी क्रूरता ने देश को मौन करा दिया पूरे देश में बर्बर हत्याकांड की भर्त्सना की गई गांधीजी ने बोअर युद्ध के दौरानहंटर आयोग का गठन किया । इस हत्याकांड से देश के अधिकतर लोग भयभीत हो गए थे, किन्तु किसी ने भी हार नहीं मानी, इससे वे ब्रिटिशों के खिलाफ लड़ाई के लिए और अधिक मजबूत हो गये. रबिन्द्र नाथ टैगोर जिन्हें पहला एशियाई नॉबेल पुरस्कार प्रदान किया था को जब इस घटना के बारे में पता चला तो उन्होंने ब्रिटिशों द्वारा दी गई नाइटहुड की उपाधि वापस लौटा दी और कहा कि – ऐसे हत्यारों को कोई भी पुरस्कार देने का हक नहीं है. वहीं दूसरी ओर गांधी जी का अंग्रेजों पर से विश्वास उठ गया. किन्तु इससे उनका एवं देशवासियों का ब्रिटिशर्स के खिलाफ लड़ने का संकल्प नहीं टूटा. हमेशा अहिंसा के मार्ग पर चलने वाले गांधी जी ने देशवासियों से स्वराज को अपनाने के लिए कहा और असहयोग आंदोलन शुरू किया. इसमें उन्होंने विदेशी वस्तुओं का उपयोग न करने और उनके द्वारा दी जा रही सुविधा का उपयोग न करने का निश्चय किया था. हालाँकि इस आंदोलन में कुछ भारतीय राजनेताओं ने शामिल न होना ठीक समझा, किन्तु युवा पीढ़ी द्वारा इसका पूरा समर्थन किया गया था. इससे इस आंदोलन को सफलता मिलने लगी और इस सफलता को देख ब्रिटिश चौंक गये. फिर बाद में इस आंदोलन को भी बंद करना पड़ा जब इसने भी हिंसा रूप ले लिया।
हंटर आयोग गठित
ब्रिटिश सरकार ने जलियांवाला बाग की घटना की जांच के लिए 14 अक्टूबर 1919 को हंटर कमीशन नाम से एक आयोग नियुक्त किया। यह लॉर्ड विलियम हंटर की अध्यक्षता में 7 सदस्यीय आयोग था। आयोग ने मार्च 1920 को अपनी अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें उसने जनरल ड्वायर के कृत्य की निंदा की। हालांकि, इसने जनरल ड्वायर के खिलाफ कोई जुर्माना नहीं लगाया या कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की।
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